कुछ बहते है कुछ , साथ चलते है!
जीवन की परम उर्जा
जो प्रवाह को आतुर है
से टूट कर टकराती है ....
कुछ तो विलीन हो जाती है
अपने आस्तित्व मिटा कर
कुछ अपने दिशा बदल लेते है
और मैं अपना वजूद खोजता
सम्पूर्ण तरल में डुबकी लगाता हूँ
पारस तो नही मिला पुरे सफ़र में
पर पिघलने की कोशिश में
हर बार खली हाथ,
कुछ साथ नही जो बहता हो.......
शायद आस्तित्व खो रहा हूँ
और शायद डरता हूँ
की गहरे में
न कुछ मिटता है ..............
न कुछ पिघलता है ................


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