Thursday, March 25, 2010

वर्षो के जमा पिघलते है............
कुछ बहते है कुछ , साथ चलते है!
जीवन की परम   उर्जा
जो प्रवाह को आतुर है
सृष्टी की आसिम शक्ति
से टूट कर टकराती है ....
कुछ तो विलीन हो जाती है
अपने आस्तित्व मिटा कर 
 कुछ अपने दिशा बदल लेते है
और मैं  अपना वजूद खोजता   
सम्पूर्ण तरल में डुबकी लगाता हूँ  
पारस  तो नही मिला  पुरे सफ़र में
पर पिघलने की कोशिश में
हर बार खली हाथ,
कुछ साथ नही जो बहता  हो.......
शायद आस्तित्व खो रहा हूँ 
और शायद डरता हूँ
की गहरे में
न कुछ मिटता है ..............
न कुछ पिघलता है ................

Monday, March 22, 2010

ek ankur..............


एक अंकुर निकला बिज़ से....

थी धुप में ऐसी आभा
या होने का था प्रोयोजन
थी चांदनी कुछ छेड़ गई
या वर्षो का था संकलन

लो कठिन कशमकश बीत गये
अब सृजन का है सहज प्यार
अंगो में दिखे स्फूर्ति चिन्ह
हुई सिथलता का तिरस्कार

मुरलीवाले का संख्नाद  
रंगमंच का पर्दा खुल गया
अब चकाचौध स्फुटित हुई
सब पाठ  पुराना भूल गया
  
अंकुर निकला बिज़ से ...............